पापा...

पापा...

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Riya Pandey
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About this book

मां उधेड़ कर अपने कलपुर्जों को,बची खुची कतरनों से,बुनती है एक दैहिक लिबास,अपना आंचल,रेशे-रेशे बिथरा करउंगलियों की सलाई पर,गुथती है श्वास और नाड़ियों का संचार,मां ख़ुद को निचोड़कर,खींचती है कपोलों की मुस्कान,रंगती है हमारा स्वाभिमान।मां गढ़ती हैं मन-भाव और लिबा...