वस्ल का चांद

वस्ल का चांद

श्वेता सागर
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About this book

वस्ल का चांदवो आसमान ताकते अपने ही ख्या़लों में गुम थी कि एक कर्कश आवाज़ ने उसका ध्यान अपनी ओर खींचा, "आप फिर यहां आ गई? कहा ना, आज चांद नहीं निकलेगा!" चिढ़ा हुआ वह लहजा उसकी आंखों में ख़ौफ भर गया।वह चिहुंक कर पीछे पलटी और अगले ही पल उसकी मासूम, ख़ाली आंखों में...