पिता की डायरी, उनकी पुरानी घड़ी और जूतेएक शाम मैं पिता जी की दुकान संभाल रही थी,आए हुए ग्राहकों को सामान दे रही थी।अचानक मेरी नज़र उस पुराने रजिस्टर पर पड़ी,जिसके एक पन्ने पर उनकी लिखी कविता जड़ी थी।उस दिन मैंने महसूस किया, वे बहुत कुछ कहकर भी नहीं बताते हैं,प...