चलता हुआ समय,रुके हुए हम,न जाने किस घड़ी के इंतज़ार मेंगंवाए जा रहे हैंअपने अस्तित्व की गरिमा।वो न आया,यादों से धूसरित आई एक आँधी,विचारों में परिणत होलिया जिसने मनन-चिंतन कास्वरूप तूफ़ानी।सूखी पड़ी थी उम्मीदों की खेती,क्योंकि चले गए थेबादल प्रेम के बस उमड़-घुम...