योग दिवस: "आदियोगी से संवाद"थक चुका था मैं जीवन की इस अंधी, अंतहीन दौड़ से,मन अशांत था, भाग रहा था दुनिया के इस शोर से।छोड़कर पीछे सब माया, मैं हिमालय की ओर चल दिया,बर्फ की चादर ओढ़े पर्वतों ने, मेरा मौन स्वीकार किया।खोजते-खोजते शांति, एक कंदरा के द्वार पर आ...