यादों का बोझ

यादों का बोझ

A
Arun Pratap Singh
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About this book

समय का दर्पण अब धुँधला गया है,आँखों में जाने क्या चुभता जा रहा है ।बीती यादों का बोझ लेकर मन में,खुद में ही इंसान घुटता जा रहा है ।आर्या ✍️