पिता की विरासतघर के कोने में रखी वो पुरानी घड़ी,आज भी वक्त नहीं, उनका अहसास बताती है।टिक-टिक की हर इक धीमी आवाज़ में,मुझे पापा की वो चिर-परिचित डांट याद आती है।सहेज कर रखी है मैंने पिता की डायरी,जिसके हर पन्ने पर उनका अक्स दिखाई देता है।इन कोरे कागज़ों पर बिखरक...