हाँ, मैं एक शिक्षिका हूँ!घर की जिम्मेदारियाँ और माथे पर बिंदी सजाकर,मैं निकलती हूँ रोज़ अपनी एक नई दुनिया बसाकर।कभी चूल्हे की आंच, तो कभी ममता का घेरा,इन्हीं संघर्षों के बीच होता है मेरा नया सवेरा।हाँ, मैं एक शिक्षिका हूँ!मेरे झोले में सिर्फ किताबें और कलम नही...