व्यथा

व्यथा

A
Arun Pratap Singh
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About this book

हृदय की व्यथा अब व्यक्त न होती,मौन धारण करके इन अधरों को सिल लिया,मोह-माया का परदा नयनों से हटा जब,प्रेम पाने की चाह में वैराग्य मिल गया ।आर्या ✍️