यू ही नहीं कभी आँखों में रात कट जाती है,यू ही नहीं रहते हैं आज़कल हम बेचैन से ।कुछ बेचैन सा करता है रातों में, बीते पलों की याद जीने कहाँ देती है चैन से । ✍️ अरुण प्रताप सिंह "आर्या"