तू चल कि पंथ स्वयं आकार लेगा,अंधकार की भीत चीरकरकोई नव-अरुण उद्गार लेगा।तू चल भले पगों में शूल चुभें हों,धूप तपी हो माथे ऊपर,मन में यदि विश्वास जगा होतो कांटे भी फूल से उगें हों।तू चल जब जग तुझको रोक रहा हो,हाथ पकड़कर संशय तेरातेरे ही सम्मुख झोंक रहा हो,तब अपनी निस्तब्ध दृगों मेंएक अग्नि का दीप जला ...