वक्त क़ी सलतनत :वक्त क़ी दास्तां सुनाता हूँ,वक़्त ने जो चाहा वो किया!वक़्त चाहे तो चलती ज़िन्दगी,जी रहे वक़्त का एक एक पल दिया!वक़्त होता नहीं सगा किसी का,चाहे सजनी हो या हो किसी का पिया!वक़्त कब ठहरा किसी के लिए,वक़्त ने वक़्त के हिसाब से सब किया!वक़्त क़ी सलतनत के आगे झ...