देखते रह गए ( नज़्म  )

देखते रह गए ( नज़्म )

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Sarfraz Ahmad
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About this book

कुछ नहीं कर सके, देखते रह गएख़्वाब आँखों में ही टूटते रह गएउसकी डोली उठी थी मेरे हाथों सेहाथ मजबूर थे, काँपते रह गएदिल ने चाहा कि आवाज़ दें रोक लें,लब मगर ख़ामुशी ओढ़ते रह गएकुछ नहीं कर सके, देखते रह गएएक दस्तूर था हम निभाते रहेअपने एहसास दिल में दबाते रहे वो...