शीर्षक:-विक्षिप्त मानवताविधा:- साहित्यिक “गद्य”शैली:- सामाजिकदिनाँक :-28.06.2026-----------------------सुबह का उजाला हर दिन की तरह धरती पर उतरता है, पर अब वह केवल प्रकाश नहीं लाता; वह मनुष्य के भीतर पसरे अँधेरे को भी उजागर कर देता है। सभ्यता ने ऊँची इमारतें बन...