Ghazal

Ghazal

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Sarfraz Ahmad
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About this book

उससे रिश्ता बिगाड़ बैठा हूँ अपनी दुनिया उजाड़ बैठा हूँजिसको मंज़िल समझ के जीता थाउस से दामन ही झाड़ बैठा हूँ जिसको सींचा था प्यार से मैंने वो शजर भी उखाड़ बैठा हूँ अब ज़रूरत नहीं मुझे उसकीख़्वाहिशें सब पछाड़ बैठा...