पश्चिम की तरफ आसमान का रंग अब तांबे जैसा होने लगा था। राजधानी के निचले हिस्से, यानी कुम्हार टोली और जुलाहों की बस्ती में धुआं उठने लगा था। दिन भर भट्ठियों में पकने वाले मिट्टी के बर्तनों की गंध अब शाम के खाने के लिए जलने वाली सूखी लकड़ियों के धुएं में मिल रही...